महागाथा रामायण से जुड़ी कई अद्भुत कथाएँ प्रचलन में हैं। उन्हीं में से एक कथा यह भी है।
ये कहानी उस महान सती की है जिसके तपश्चर्य ने एक पुरुषोत्तम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनाया। समय था त्रेता युग के तीसरे चरण का। महाबली रावण त्रिलोक में अपना प्रभाव जमा चुका था। वो देवताओं को भयभीत करता था और पृथ्वीवासियों से कर वसूलता था।
एक बार उसने अपने सेनापति प्रहस्त को ऋषियों से कर वसूलने भेजा। रावण के मन में ऋषियों के प्रतिद्वेष था, क्योंकि वे यज्ञबल से देवताओं को बलशाली बनाते थे और देवता राक्षसों को मारते थे।
ऋषियों ने इकट्ठे होकर एक मटके में अपना रक्त एकत्रित किया और यह कहते हुए प्रस्त को दिया कि ये कर रावण का नाश करेगा। प्रहस्त ये लेकर सैन्य सहित लौटा। जनपुरी के निकट उत्सुकता वश उसने मटका खोलकर देखा। मटके में रक्त देखकर वो घबरा गया। उसे अशुभ और रावण के कोप का भय हुआ।
राजा जनक देवताओं के मित्र थे और उनकी कई बार सहायता कर चुके थे। प्रहस्त ने सोचा कि ये मटका यहाँ इसके राज्य में गाड़कर चलते हैं। ऋषियों के शापित रक्त से जनक का अंत हो जाएगा। मटका गाड़कर वो चला गया।
इधर, जनकपुरी में भीषण आकाल पड़ा। राजपुरोहित अथवा किन्हीं महर्षि के सुझाव पर वर्षा होने के लिए राजा जनक ने एक धार्मिक महामहोत्सव के बाद हल से भूमि को जोता। ऋषियों के रक्त से भरा मटका यहीं भूमि में दबा था जो हल की सोने की नोक (सीता) में अड़ गया। खोदकर निकालने पर वो दिव्य मटका प्राप्त हुआ। मटके को खोलने पर उसमें एक नवजात कन्या मिली, जिसे मटके के हल की नोक (सीता) के नाम पर सीता नाम मिला। बाद में यही सीता दशरथपुत्र श्रीराम की अर्धांगिनी बनीं। दशरथ की प्रिय पत्नी कैकयी के कहने पर श्रीराम को 14 साल का वनवास मिला। इसी वनवास के दौरान श्रीराम और लक्ष्मण पर वन में रावण की बहन शूर्पणखा काम मोहित हो गई। जब वो सुंदरी का रूप बनाकर श्रीराम और लक्ष्मण के समक्ष सहवास करने का प्रस्ताव लेकर पहँुची तो उन्होंने उसे समझाया इस पर उसने सीता पर आक्रमण कर दिया। शूर्पणखा श्रीराम और लक्ष्मण पर काम मोहित थी और सीता को मार्ग का काँटा जान रही थी। भाभी को संकट में जान और उस निर्लज्ज को पाठ पढ़ाने के लिए लक्ष्मण ने उसकी नाक और कान काट डाले। व्यथित शूर्पणखा अपने मुँह बोले भाइयों खर और दूषण के पास पहँुची। वो श्रीराम से लडऩे जा पहँुचे। श्रीराम ने उसकी ओर से लडऩे आए खरदूषण का सैन्य सहित अकेले ही संहार कर डाला। शूर्पणखा ने अब ये बात जाकर रावण को बताई तो क्रोधित रावण सीता का हरण कर ले गया और श्रीराम और लक्ष्मण के हाथों कुल सतित समाप्त हो गया।
कहते हैं- एक लाख पोते, सवा लाख नाती। उस रावण घर, दिया न बाती।।
अप्रचलित कथाओं में देवी सीता को रावण की पुत्री कहा जाता है। उनके जन्म की उक्त कथा से ये बात तो स्पष्ट होती है कि किसी भी भौतिक (स्थूल) शरीर के निर्माण में रज (रक्त) और वीर्य (ओज-तेज) अत्यावश्यक है। रज (रक्त) माँस का तो वीर्य (ओज-तेज) हड्डियों और अस्थियों का निर्माण करते हैं। किसी भी स्थूल शरीर के निर्माण में रक्त और वीर्य का समागमऔर संतुलन आवश्यक है। देवी सीता को ऋषियों ने जहाँ माता की भाँति रक्त (रज) प्रदान किया वहीं रावण के उद्देश्य ने वीर्य (ओज-तेज) रूपी कारण बनकर सीता को अस्तित्ववान किया। यहाँ ऋषियों ने रक्त देकर माता का दायित्व निभाया वहीं रावण पिता के रूप मेंं कारण बना। इसलिए कई जगह सीता को रावण की बेटी बताया जाता है। विभिन्न रामायणों के प्रकरणों में रावण को मन ही मन सीता को नमन करते भी बताया जाता है। वैसे भी, सीता की आयु रावण की पुत्री के बराबर थी। इसी कारण से कई जगह सीता को रावण की पुत्री बताया जाता है।
ये कहानी उस महान सती की है जिसके तपश्चर्य ने एक पुरुषोत्तम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनाया। समय था त्रेता युग के तीसरे चरण का। महाबली रावण त्रिलोक में अपना प्रभाव जमा चुका था। वो देवताओं को भयभीत करता था और पृथ्वीवासियों से कर वसूलता था।
एक बार उसने अपने सेनापति प्रहस्त को ऋषियों से कर वसूलने भेजा। रावण के मन में ऋषियों के प्रतिद्वेष था, क्योंकि वे यज्ञबल से देवताओं को बलशाली बनाते थे और देवता राक्षसों को मारते थे।
ऋषियों ने इकट्ठे होकर एक मटके में अपना रक्त एकत्रित किया और यह कहते हुए प्रस्त को दिया कि ये कर रावण का नाश करेगा। प्रहस्त ये लेकर सैन्य सहित लौटा। जनपुरी के निकट उत्सुकता वश उसने मटका खोलकर देखा। मटके में रक्त देखकर वो घबरा गया। उसे अशुभ और रावण के कोप का भय हुआ।
राजा जनक देवताओं के मित्र थे और उनकी कई बार सहायता कर चुके थे। प्रहस्त ने सोचा कि ये मटका यहाँ इसके राज्य में गाड़कर चलते हैं। ऋषियों के शापित रक्त से जनक का अंत हो जाएगा। मटका गाड़कर वो चला गया।
इधर, जनकपुरी में भीषण आकाल पड़ा। राजपुरोहित अथवा किन्हीं महर्षि के सुझाव पर वर्षा होने के लिए राजा जनक ने एक धार्मिक महामहोत्सव के बाद हल से भूमि को जोता। ऋषियों के रक्त से भरा मटका यहीं भूमि में दबा था जो हल की सोने की नोक (सीता) में अड़ गया। खोदकर निकालने पर वो दिव्य मटका प्राप्त हुआ। मटके को खोलने पर उसमें एक नवजात कन्या मिली, जिसे मटके के हल की नोक (सीता) के नाम पर सीता नाम मिला। बाद में यही सीता दशरथपुत्र श्रीराम की अर्धांगिनी बनीं। दशरथ की प्रिय पत्नी कैकयी के कहने पर श्रीराम को 14 साल का वनवास मिला। इसी वनवास के दौरान श्रीराम और लक्ष्मण पर वन में रावण की बहन शूर्पणखा काम मोहित हो गई। जब वो सुंदरी का रूप बनाकर श्रीराम और लक्ष्मण के समक्ष सहवास करने का प्रस्ताव लेकर पहँुची तो उन्होंने उसे समझाया इस पर उसने सीता पर आक्रमण कर दिया। शूर्पणखा श्रीराम और लक्ष्मण पर काम मोहित थी और सीता को मार्ग का काँटा जान रही थी। भाभी को संकट में जान और उस निर्लज्ज को पाठ पढ़ाने के लिए लक्ष्मण ने उसकी नाक और कान काट डाले। व्यथित शूर्पणखा अपने मुँह बोले भाइयों खर और दूषण के पास पहँुची। वो श्रीराम से लडऩे जा पहँुचे। श्रीराम ने उसकी ओर से लडऩे आए खरदूषण का सैन्य सहित अकेले ही संहार कर डाला। शूर्पणखा ने अब ये बात जाकर रावण को बताई तो क्रोधित रावण सीता का हरण कर ले गया और श्रीराम और लक्ष्मण के हाथों कुल सतित समाप्त हो गया।
कहते हैं- एक लाख पोते, सवा लाख नाती। उस रावण घर, दिया न बाती।।
अप्रचलित कथाओं में देवी सीता को रावण की पुत्री कहा जाता है। उनके जन्म की उक्त कथा से ये बात तो स्पष्ट होती है कि किसी भी भौतिक (स्थूल) शरीर के निर्माण में रज (रक्त) और वीर्य (ओज-तेज) अत्यावश्यक है। रज (रक्त) माँस का तो वीर्य (ओज-तेज) हड्डियों और अस्थियों का निर्माण करते हैं। किसी भी स्थूल शरीर के निर्माण में रक्त और वीर्य का समागमऔर संतुलन आवश्यक है। देवी सीता को ऋषियों ने जहाँ माता की भाँति रक्त (रज) प्रदान किया वहीं रावण के उद्देश्य ने वीर्य (ओज-तेज) रूपी कारण बनकर सीता को अस्तित्ववान किया। यहाँ ऋषियों ने रक्त देकर माता का दायित्व निभाया वहीं रावण पिता के रूप मेंं कारण बना। इसलिए कई जगह सीता को रावण की बेटी बताया जाता है। विभिन्न रामायणों के प्रकरणों में रावण को मन ही मन सीता को नमन करते भी बताया जाता है। वैसे भी, सीता की आयु रावण की पुत्री के बराबर थी। इसी कारण से कई जगह सीता को रावण की पुत्री बताया जाता है।

No comments:
Post a Comment